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मूल्य- १००/-

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ई इल्हाब्बाद है भैया

नई किताब

मूल्य- १२०/- रुपये 


इन सपनों को कौन गायेगा

अजेय का काव्य संकलन

आज की हिंदी कविता में अजेय की आवाज़ हमारे सीमित कर दिए भूगोल में भले सुदूर हिमाचल की आवाज़ के रूप में स्‍थापित की जा रही हो, लेकिन कविता में विचार की अनन्‍त भूमिका को स्‍वीकारने वाले मुझ जैसे पाठकों के लिए वह बहुत निकट की आवाज़ है….कई बार तो ख़ुद हमारे भीतर की आवाज़। समकालीन हिंदी कविता की आत्‍मा जिस प्रगतिशील आन्‍दोलन में वास करती है, अजेय की कविताएं ठीक वहीं जन्‍म लेती हैं। बहुत दूर मुख्‍यधारा से एक कटे हुए… अब तक अनाम से रहे स्‍थान के कवि अजेय ने किसी लोक-विशेष को नहीं, उसमें रहने-बसने वाले मनुष्‍य और उसकी उत्‍कट जीवनशक्ति को आकार दिया है। मुझे बख़ूबी याद है कि अजेय को पहली बार हमारे समय की सबसे महत्‍वपूर्ण पत्रिका पहल ने अपने शुरूआती पन्‍नों में कविता में कुछ बिलकुल नया पा लेने के उत्‍सव की तरह छापा था। इसके बाद अजेय ने निरन्‍तर उस विश्‍वास को बनाए रखा है, जिसे पहल के सम्‍पादक ज्ञान जी ने रेखांकित किया था – कहना ही होगा ज्ञानरंजन और पहल की अत्‍यन्‍त विचारवान और सक्रिय भूमिका से ही अस्‍सी के बाद की हिंदी कविता का स्‍वरूप और भविष्‍य निर्धारित हुआ है और अजेय इसी कविता संसार के कवि हैं।

ये कविताएं बर्फ़ से ढंकी उस ज़मीन के वास्‍तविक ताप का अहसास कराती हैं, जहां मनुष्‍य और प्रकृति आपस में घुलमिल जाते हैं। भोजवन और ब्‍यूंस की टहनियों के प्रदेश की इन कविताओं में आदमी को ज़िन्‍दा रखने वाली आंच है, एक गुनगुना सुखद अहसास है और मनुष्‍यता के पक्ष में एक लम्‍बी और ज़रूरी जिरह भी। हमें अब अच्‍छी तरह समझ लेना चाहिए कि बिना बहस के कोई भी कविता मर जाती है। यह देखना सुखद है कि अंतिम निष्‍कर्ष की भंगिमा के बजाए अजेय की ये कविताएं अपनी पढ़त में बहस की बहुत सारी गुंजाइश छोड़ती हैं – इसे इन कविताओं की मनुष्‍यता कहा जाना चाहिए। ऐसे वक्‍़त में जब कवि विद्वज्‍जन अपने से बाहर की जगहों का सम्‍मान करना छोड़ रहे हैं, तब अजेय की कविता विश्‍वास दिलाती है कि किसी भी तरह की रूढ़िवादी निजता और कट्टरता से बाहर सम्‍भव करने के लिए एक बहुत बड़ा संसार हमेशा मौजूद है और रहेगा। अजेय की ही पंक्ति का सहारा लें तो वे ‘सामूहिक ऊर्जा से आविष्‍ट स्‍नायुतंत्र’ के कवि हैं और यह भी सोचें कि आज की कविता में ऐसे कितने कवि हैं…

कवि के साथ ही दखल को भी मैं उसके पहले प्रकाशन और संचयन के लिए बधाई देता हूं।

* शिरीष कुमार मौर्य

संकलन बुक कराने के लिए पर dakhalprakashan@gmail.com मेल करें, या कमेन्ट बाक्स में लिखें. मूल्य १२०/- रुपये